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2019 में प्रचंड बहुमत से जीतकर मोदी सरकार को दूसरा कार्यकाल मिला है. जनता का दिल जितने के लिए मोदी सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को पाटरी पर लाने की अहम जिम्मेदारी है.

लिहाजा मोदी सरकार के सामने कई प्रकार की आर्थिक चुनौतियां खड़ी है. इन चुनौतियों से मोदी सरकार को निपटना बहुत जरूरी है, जिससे सरकार 2024 के लिए भी अपनी तैयारियां कर सके.

आइए आपको बताते हैं उन आर्थिक चुनौतियों के बारे में, जिनसे मोदी सरकार को निपटने की सख्त जरूरी है. (ये भी पढ़ें: 24 घंटे मिलेगी सभी को बिजली! पावर सेक्टर के लिए मोदी सरकार ने बनाया 100 दिन का पावरपैक प्लान)

निवेश को बढ़ावा

मोदी सरकार को निवेश पर खास तौर से ध्यान देने की जरूरत है. जब तक निवेश में बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब आर्थिक गति मिलना मुश्किल है. इकोनॉमिक ग्रोथ इन दिनों विवादित रही है. इसलिए आर्थिक वृद्दि और निवेश की सख्त जरूरत है.

भारत में निवेश पिछले कुछ साल से घटा है. साल 2011-12 में निवेश 34.3 फीसदी था, जोकि साल 2017-18 में गिरकर 28.4 फीसदी पर आ गया. सबसे ज्यादा चिंता की बात य है कि सेक्टरल लेवल में जीएसएफ घट रहा है.

उत्पादन और खनन जैसे रोजगार गहन क्षेत्रों में जीएसएफ का उत्पादन का अनुपात कम नहीं, बल्कि समय क साथ दिनों दिन घटता जा रहा है.

नई सरकार को चुनौती ये है कि निवेश के माहौल में सुधार करना है. पॉलिसी में आने वाली अड़चनों को दूर करना होगा. जिससे अर्थव्यवस्था में सुधार आ सके. जिससे आर्थिक वृद्दि और रोजगार को बढ़ावा मिल सके.

घटती सेविंग को बढ़ाएं

भारत की अर्थव्यवस्था का मूल आधार बचत (सेविंग) हैं. ऐसे में बचत पर खास तौर से ध्यान देना होगा. साल साल 2011-12 में 33.8 फीसदी बचत होती थी, जो घटकर साल 2017-18 में 30.1 फीसदी पर पहुंच गई है.

घरेलू बचत साल 2011-12 में ग्रॉस सेविंग 68.2 फीसदी से घटकर 2017-18 में 56.3 फीसदी पहुंच गई है. वास्तविक रूप से घरेलू क्षेत्र की बचत कम हो गई है. इससे निवेश, वृद्धि और आर्थिक स्थिरता को खतरा बढ़ जाएगा.

इसी तरह से, साल 2011-12 में 7.8 लाख करोड़ रुपये संगठित बैंकों से पर्सनल लोन लिया गया. जो कि 8 साल में 19 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है.

143 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. जबकि घरेलू बचत में काफी गिरावट आई है. ऐसे लोन कि जिमेमेदारी एनबीएफसी सेक्टर की नहीं है.

रोजगार और सामाजिक सुरक्षा

पिछले कुछ सालों से रोजगार सृजन का मुद्दा काफी विवादित रहा. सा ल2016 में अंतिम सर्वे से पता चला कि केवल 17 फीसदी लोग ही संगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं. एक तिहाई लोगों को कैजुअल लेवल पर काम दिया जाता है. संयोग से अब ऐसे सर्वे बंद हो चुके हैं.

लेकिन जब हम भारत की बेरोजगारी दर के अधिकारिक आंकड़ों पर चर्चा करते हैं तब इसकी चुनौती केवल रोजगार सृजित करने की नहीं, बल्कि रोजगार की गुणवत्ता में सुधार की भी जरूरत रहती है.

पांचवें रोजगार-बेरोजगार सर्वे से पता चलता है कि, काम के लिए मौजूद लोगों में से 60.6 फीसदी लोगों को देश में रोजगार मिला.

जबकि रूरल एरिया में 52.7 फीसदी लोगों को काम मिला. 42.1 फीसदी लोगों को 6 से 11 महीने के लिए आंशिक रूप से काम मिला. सरकार के लिए रोजगार देने के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. सरकार को जरूर तहै कि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार देकर बेरोजगारी के आंकड़े को कम करे.

राजस्व घाटा कम करना

सरकार को सबसे बड़ी चुनौती है अपने राजकोषीय घाटे को कम करना. सरकार के लिए महत्वपूर्ण है कि राजस्व घाटे को नियंत्रण में रखे. हालांकि, सरकार अपने बुनियादी ढांचे जैसे उत्पादक उद्देश्यों पर अपने खर्च को संभाले रह सकती है.

जिससे राजकोषीय घाटे को कम करना आसान हो सकता है. साल 2019-20 में राजस्व घाटे का लक्ष्य 2.2 फीसदी रखा गया है. रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के लिए फिस्कल स्पेस बनाने के लिए सरकार को राजस्व घाटे क जीरो करने की जरूरत है.

वित्तीय क्षेत्र में सुधार की जरूरत

मजबूत वित्तीय सेक्टर का मतलब होता है कि सेविंग में ग्रोथ हो और निवेश को बढ़ावा मिले. बैंकिंग सेक्टर में मंडरा रहे संकट के बादलों को खत्म करना होगा. साथ ही ही बढ़ रहे एनपीए को भी कम करना होगा.

यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी है कि लोन ग्रोथ जीडीपी ग्रोथ के बराबर रखने की कोशिश करे. अन्यथा अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है.

नई सरकार के सामने आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार और आरबीआई के बीच बेहतर तालमेल रहे. कुल मिलाकर सरकार को अपनी जनता पर भरोसा बनाए रखने के लिए आर्थिक चुनौतियों पर खास तौर से ध्यान देना होगा. ताकि मोदी सरकार की साख बनी रहे.

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